सिया राव ने घड़ी की ओर देखा—过去两小时后, सुबह के छह बजकर बीस मिनट। पेंटहाउस की फर्श-से-छत वाली खिड़की से झरती रोशनी ने मेज पर फैले ड्राफ्टिंग पेपर के किनारों को हल्का सुनहरा कर दिया था। देवांश मेहरा ने आठ बजे के इन्वेस्टर कॉल को रद्द कर दिया था; उसकी उँगलियाँ डायल पैड के ऊपर तीन सेकंड तक हवा में रुकी रहीं, फिर धीरे से वापस खींच ली गईं, जैसे कोई अदृश्य डोरी उन्हें खींच रही हो। सिया ने उसकी प्रतिक्रिया को नोट किया—कंधे का हल्का झुकाव, आवाज़ में छिपी रुकावट—पर कुछ नहीं कहा।
उसने पेंसिल उठाई। नोक कागज पर रगड़ खाती हुई आगे बढ़ी, हर मिलीमीटर पर दबाव बढ़ता गया। रेखा सीधी, फिर एक कोण पर मुड़ी, ठीक उसी जगह जहाँ ऑफशोर अकाउंट के आंकड़े लिखे थे। पेंसिल की नोक टूटने की छोटी-सी आवाज़ हुई; सिया की उँगलियाँ सफेद पड़ गईं, फिर ढीली हुईं। “हर ट्रांसफर मेरी फर्म के रूट से गुजरेगा,” उसने कहा, वाक्य को बीच में रोककर, “बोर्ड को कोई आपत्ति नहीं हो सकती।” देवांश ने सिर हिलाया। सुबह सात बजे सिया ने नया निर्देश दिया, “इन्वेस्टर कॉल अब मेरे माध्यम से ही होगा, कोई भी सीधा संपर्क नहीं।” देवांश के चेहरे पर हल्की ऐंठन छा गई, हृदय की धड़कन असमान हो चली।
सिया ने पेंसिल को मेज पर रखा। देवांश ने लैपटॉप बंद किया, कंधे और भी झुक गए। “अगर यह काम कर गया तो प्रेस को जवाब देने का आधार मिल जाएगा,” उसने कहा, आवाज़ में थकान की रेत घिसी हुई। सिया ने उत्तर नहीं दिया। उसकी साँसें स्थिर रहीं, पर पेंसिल के टूटे टुकड़े को उँगली से घुमाते हुए उसने सोचा—संरचना मजबूत रहे, ठीक वैसे जैसे फ्लैगशिप टावर की नींव। सुबह आठ बजे, सिया ने अगला आदेश जारी किया, “प्रिया से मिलने से पहले सभी दस्तावेज़ मेरे पास जमा करो।” देवांश की सांस और भी उथली हुई, छाती में दबाव बढ़ता गया।
प्रिया देशमुख के कदम स्टूडियो के बाहर से सुनाई दिए। सिया ने दरवाजे के हैंडल को छूने से पहले ठंडक महसूस की—धातु की सतह पर उँगलियों के निशान जैसे जमे हों। प्रिया ने दरवाजा खोला, अँगूठी को अँगूठे और तर्जनी के बीच घुमाते हुए, हर चक्कर के साथ गति बढ़ती गई। उसने प्रिंटआउट मेज पर पटका; कागज का किनारा सिया की उँगली के नीचे सिकुड़ गया। “वुमेन आर्किटेक्ट्स अलायंस ने तुम्हारी मेंबरशिप सस्पेंड कर दी है,” प्रिया ने कहा, आवाज़ में व्यंग्य की लहर, “मैंने तीन सदस्यों से बात की। उनके पास अनुबंध के सबूत हैं।” सिया ने कागज उठाया। प्रिया की अँगूठी अब तेजी से घूम रही थी, चमकती हुई। “तुमने मुझे बाहर रखा। अब सब कुछ सार्वजनिक हो रहा है।” सिया ने कागज मोड़ा और जेब में रख लिया। प्रिया ने बैग मेज पर पटका, कदमों में भारीपन, फिर स्टूडियो से निकल गई, दरवाजा बंद होने की आवाज़ फर्श पर गूँजती रही।
सिया अकेली खड़ी रही। उँगलियाँ कागज के किनारे पर रहीं, साँस लेने की गति धीमी हुई, फिर तेज। सुबह आठ बजे पैंतालीस मिनट, बोर्ड मीटिंग शुरू होने से पहले, सिया ने देवांश को नया निर्देश दिया, “मीटिंग में कोई भी बयान मेरी मंजूरी के बिना नहीं।” देवांश के कदम लड़खड़ाए, हृदय की असुविधा अब स्पष्ट रूप से चेहरे पर दिख रही थी।
समीर खान ने ठीक उसी समय पेंटहाउस में प्रवेश किया। वह पुराना लेजर लेकर आया था। देवांश को देखकर उसने कहा, “तुम्हारा स्ट्रेस बढ़ रहा है। हृदय की स्थिति और खराब हो रही है।” समीर ने लेजर खोला, पर कलम उठाने से पहले उँगलियाँ तीन सेकंड तक पेन के ऊपर रुकीं, जैसे कोई नाड़ी जांच रहा हो। “यह नोट अब रिकॉर्ड पर है। अगर तुम आराम नहीं लोगे तो अगला दौरा अस्पताल में होगा।” देवांश ने खिड़की की ओर देखा, माथे पर ठंडा पसीना उभरा। “मुझे अभी मीटिंग करनी है।” समीर ने लेजर बंद किया और चला गया।
देवांश का फोन बज उठा। बोर्ड चेयरमैन की आवाज आई। “स्टॉक सात प्रतिशत गिर चुका है। प्री-मार्केट रूमर्स के कारण। दस बजे इमरजेंसी मीटिंग बुलाई गई है।” देवांश ने फोन काटा। सिया ने ड्राफ्टिंग टेबल से सिर उठाया। “अब क्या?” देवांश ने कहा, “मीटिंग में जाना होगा।” सिया ने जवाब दिया, “मैं भी साथ चलूँगी। कोई अकेला फैसला नहीं।” देवांश की साँस अचानक तेज हुई, पेट में हल्की ऐंठन जैसी अनुभूति उसके चेहरे पर छा गई।
एलिवेटर में दोनों खड़े थे। धातु की ठंडी दीवारें सिया के हाथों को छू रही थीं। देवांश उसके बगल में खड़ा था, साँसों की लय लगभग समान, पर कंधे अभी भी झुके हुए। “अगर कुंडली की बात बाहर आई तो सब कुछ बदल जाएगा,” देवांश ने कहा, आवाज़ में रेत। सिया ने उत्तर दिया, “हम पहले से तैयार रहेंगे।” एलिवेटर के दरवाजे खुले। दोनों बाहर निकले। बोर्डरूम की रोशनी दूर से दिख रही थी, पर सिया ने देवांश की ओर देखा—उसकी आँखों में थकान की परत और गहरी हो चुकी थी।